जंगली हम

कंक्रीट के जंगलों में जंगली हम
जंगलों को काट
अपनी नश्वर दुनिया बसाए हम
जड़ हो जड़ बन
जड़ों सा रंग बदल
ठोकरें खा, अपनें खोकर भी
न हुई आंखे नम
कुछ आम बातें हैं बहुत खास
और कुछ खास हैं बहुत आम
सवेरे को कोस-कोस कोसों चले
देखते-देखते सुबह हुई शाम
व्यवस्था-अव्यवस्था के बीच
हम झूल रहे
सुरक्षा-असुरक्षा में फर्क
हम भूल रहे
डूबता जहान सागर में
सागर खुद में नहीं
भ्रमित संसार में वनवास हमारा
सच है, कोई भ्रम नहीं
अंतः स्याह जो
उसका अम्बर श्वेत आडम्बर
प्रकृति के घावों को हरा कर
हरा कर करे लाल
अम्बर का अम्बर पीताम्बर
बढ़ रही आबादी पर
कहाँ हम आबाद हैं
मर्ज़ी का सच सुनने वालों की
बढ़ रही तादाद है
कल कभी किसी का आता नहीं
जो है, जैसा है
बस आज ही आज है ॥

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Thoughts #5

If there is logic in something then you are thinking by brain. But if there is no logic and still you want to do that thing then you must be thinking by your heart.
Mind always thinks logical but not heart. Both are useful but when we have to use what, it’s always challenging.

बुरा वक़्त

बातों में कड़वाहट बढ़ रही
व्यक्ति क्यों व्यक्तिगत हो रहा ?
मुद्दा मुद्दाहीन, तर्क तर्कहीन
बात बिना बात बढ़ रही
कुतर्क प्रधान क्यों देश बन रहा ?
आधुनिक हो गया पर मतलब कहाँ ?
कामयाब हो गया पर संतुष्ट कहाँ ?
कम में ज्यादा की चाह ने परिश्रम छीना
नींद कहाँ, चैन कहाँ अब सुकून कहाँ ?
कमाई जो दौलत रिश्तों में डाल खटास
जीते जी लुटानी यहीं
जो है भ्रम में, असल में मतवाला वही
भरोसे पर शक अगर,
शक पर भरोसा ही सही
अगर मैं गलत हूँ, तो झूठा क्यों नहीं ?
प्राथमिकताएं-परिभाषाएं बदल रही हैं
जिससे दुनिया बदल रही है
तुम मत बदल देना खुद संग पैमाना कहीं
मिलकर करेंगे हर गलत को सही
हर कोई है पीड़ित अगर
तो प्रताड़ित करने वाला कौन है ?
पृथ्वी का विनाश करने वाले लाखों
पर इसे बनाने वाला कौन है ?
क्या-क्या बताऊं, क्या-क्या छुपाऊं
सच जानने वाले ही असल में मौन हैं ॥

वियोग

हँसता हूँ पर दिल से नहीं
खुश हूँ पर खुशी से नहीं
अभी मैं हूँ
जाने कल हूँ या नहीं
तुम मिलो तो कहूँ तुमसे
अपने दिल की सारी बात
कह दूँ वो आँसू सारे
खुद से छुपाए जो सारी रात
एक बार, बस एक बार
मिलना है तुमसे
कहना है सब कुछ
आखिरी ख़्वाहिश तो नहीं
पर समझ लेना आखिरी
बरसों से बोझ बन गया हूँ
मैं खुद के लिए
आ जाना मिलने
बस एक पल के लिए
देख लेना तुम भी
कितना ज़ुल्म किए हैं खुदपर
तुमसे नफ़रत करने के लिए
विचार में हूँ थोड़ा
कहने को है बहुत कुछ
क्या-क्या कहूँ और क्या नहीं
तुमसे दरखास्त है एक
पहचान लेना मुझे
क्योंकि मैं खुद को पहचानता नहीं
भूल गया हूँ मैं
हँसता भी था मैं कभी
भीतर से मुस्कुराता भी था मैं कभी
अभी तो सब बदल गया है
हवा का रुख सा
मेरा वक़्त हो गया है
मुझमें मुझे ढूंढ़ना है
मदद कर मेरी
खो गया हूँ अंजान राह में
संभाल कर मेरी
हूँ जुदा-जुदा सा
हूँ खोया-खोया सा
बतला देना मुझे
मैं जीवित भी हूँ या नहीं ॥

Thoughts #4

Everything in the world is neutral, balance and in equilibrium state, and those who are not, they have their tendency to come in these states, even emotions, feelings, thoughts as well. Perfect is those who is perfectly balanced.
Life of anything is directly depends on its soberness, its neutrality and inversely proportional to its efficiency.
Today we are continuously going far from zero (neutral point) in positive and negative both way, and becoming more extremist/polarised. But why ?
Be ZERO. Be Balanced. Be Neutral.

Thoughts #3

If we think of putting all thoughts, proverbs and idioms in one place, then many things will look like biting each other, but in reality it is not so, for this, we have to see what is said ‘when’ and in ‘what context’.
Good thoughts are there for all the wise people not for the donkeys, the problem arise when the stupid one starts to break core meaning of thoughts from their level because they are intellectual for self. We all are intelligent in some things but at the same time stupid in other things but we see other’s negative things and our intelligence.
Success doesn’t get free rationality.

Thoughts #2

Nowadays, we all just want external aesthetics, not internal in everything in every sense. Show-off, looks good and good in taste in case of food. We ask for proof of every those things which has inner beauty because we don’t want to trust at all, and don’t seek proof of those things which is just pretension because we are becoming materialistic mentally and wanna trust on which we can see with eyes or physically present. But irony is there is no proof of everything and not everything present in physical form.
We are becoming less thinker and less believer, that’s because, we think that if all people are doing this thing, then how all can be wrong, all of them are right but actually all in the crowd are thinking same. We see ourselves safe in the crowd and afraid to be alone. We have never been taught to be alone and to ask questions. We forget that truth is always in lonely and lies in the crowd.
I know it is tough to believe but this is it.