सच्चाई की राह

सच्चाई का रास्ता है काँटों भरा दोस्त

इसलिए इसमें भीड़ नहीं होती

 

चाहते हैं सब चलना इस राह

जो चल जाए उसकी खैर नहीं होती

 

दुश्मन ही दुश्मन हैं इस जहाँ में शायद

जो इस राह में किसी से दोस्ती नहीं होती

 

मिल जायेंगे पद्चिन्हों पर चलने वाले लाखों

बस यहाँ पहल करने की पहल नहीं होती

 

दुःख-दर्द बहुत हैं, बेइन्तहाँ हैं इस राह

पर इस राह चलने वालों की हार नही होती ।

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मंज़िल

जब चलो एक नयी मंज़िल की शुरुआत हो

आवाज़ तेरी शान-ए-दहाड़

हर कदम नया शंखनाद

न झुको, न थमो

चाहे श्वेत अम्बर दिन या काली अम्बर रात हो

 

जब चलो हर कदम नयी उमंग, उल्लास, उत्साह हो

विश्वास की सवारी पर

अनसुलझे सवाल मुमकिन कर

चल एकला चल, आशीर्वाद खुदा का साथ हो

चाहे खिली धूप या भारी बरसात हो

 

थमना, संभलना, चलना हर पल तेरे हाथ हो

संतुष्टि संग संयम रख

जोशीले होश का संयोग रख

हासिल हर मुकाम, हर राह आसान हो

चाहे छाँव साँझ या दहकती आग हो

 

बढ़ा हर कदम धैर्य का धीरज, हौसला हो

पदचिन्ह बना, कीर्तिमान हासिल कर

सफर ख़त्म, मंज़िल हासिल कर

जुबां पर जहान के बलिदान स्वीकार हो

चाहे हँसते पुष्प या उड़ती सूखी राख हो

खामोशी

खामोशी शांतिपूर्ण सुरमयी सन्नाटे से

समझौता कर साजिश का हाथ मिलाती

रूह कंपन्न, विदीर्ण दिल कर दुष्ट

रात्रि की हमदर्द बन सखी कहलाती

शमशानों में भीड़, बाज़ारो में खालीपन

अन्तयेष्टि सन्देश-शहनाई सी लगती है ।

 

कच्चे बर्तन, कमज़ोर कर अंतर्मन

बेकार करती परिश्रम सब कुम्हार की

अंसुअन की पनाह पाती शुष्क आर्त पलकें

राम से बिछड़े मल्लाह पतवार की

बीहड़ों की पहचान देती, घोर शांत चित्त

मैदानी ध्यान-मग्न जुझारू सी लगती है ।

 

बेरहमी से गला घोंट लहरों की चीख

उछाल मारती समुद्र में ही समा देती

रजनी के पापों को प्रेमी बना, जुबां काट

खुलासा सब तेवर में समा देती

खेलती जज़्बाती ज़ज़्बातो से, दिखती धूर्त

यामिनी की जुबां पर ताले सी लगती है ।

 

खड़ा पर्वत पहाड़ सा, देखता वायु

लहरों को हमजोली क्रीड़ा क्रिया करते

बादल पार जाते वृक्ष शान्ति संग

विवाह रचाते अनछुई ऊंचाई छुआ करते

रिश्तो में खटास अलगाव भाव परवान

चढ़ते दरारें दिवार सी लगती हैं ।

 

चिंतन उदासी धुत्त अँधेरे की जननी

तूफानों से दीप बुझा मोम को सुलाती

खुशियाँ भोजन रात का दूत दुर्जन

पीछे पद्चिन्हों पर हाथ साफ़ कर जाती

हंसती-खेलती,  ठंडी-ताज़गी, चहकती-मुस्कुराती

सुबह मुरझाई शाम सी लगती है ।

 

वर्तमान निग़ल एक-एक ग़मो को उगल देती

तन्हाई का जैसे नशीला नशा चढ़ा है

निशि की परछाई बन ढूंढ़ती जहां

ध्वनि का शान्ति संग मिलान आवास बना है

थकी हारी हांफती हुई सहलाती दर्द-ए-दिल को

पर, अभी तो बस ये शुरुआत सी लगती है ॥

 

बाकी है

ज़मीन ठहर-ठहर कर कांपने लगी

आसमान चलना, उड़ना सीख गया

ज़िन्दगी थम-थम कर भीगने लगी

वक़्त बहना, बदलना सीख गया

इंसान हो इंसानियत, प्यार गँवा दिया

महलों में कब्र की नींव रख दिया

या अहंकारी पतझड़ को

बसंती उपवन करना बाकी है ।

 

ऐंठन में ऐंठ-ऐंठ गांठे बन

मोड़ ली बाहें एकलौता नाता तोड़ गया

सागर मोड़ने की चाहत में डूब

वक़्त से दिशा-निर्देश लेना भूल गया

जवाब दे-दे कर खुद सवाल सा हुआ

क्षितिज पार खातिर वर्तमान से बाघी हुआ

या पर्वती देवदार को

अभेद मेघ से भेद निकालना बाकी है ।

 

जड़ हो जड़ बन जड़ों सा रंग बदल

उजले अम्बर को काल कपट लहू कर गया

छाँव-छाँव छाया से गौरव पाते

अस्तित्व खो अतीत की नज़र से उतर गया

अती कर गए क्या जो मती मारी गयी

रात में जीते-जीते उम्र सारी गयी

या नादान दिल को

झरते बूंदो सा झूमना बाकी है ।

 

लगा डुबकी कुँए में रहा वंचित सागर से

अनजाने में अंतहीन पाताल बुन गया

बैठा जोगी पनघट पर, पुष्पांजलि अर्पित कर

सच्चाई से आगे बढ़ मुर्ख मुंह फेर गया

चक्र-चक्की में पिस-पिस बिगड़ी आकृति

मूर्ती खड़ी  रूप गढ़ी चुप मुस्कुराती

या मन-मंदिर को

धर्मस्थल सा पवित्र करना बाकी है ।

 

घुलमिल-घुलमिल उलझा-सुलझा इस कदर

अहं, वहम, मैं में खुद को हार गया

हर दूसरे छूटे छोर खातिर

आसमान का पंछी समुद्री-तैराक हो गया

घड़ी-घड़ी खड़ा घड़िया गिनता रहा

हार जीत को जीत पर हार चढ़ाता रहा

या मुस्कुराती साँझ को

तबस्सुम सवेरा करना बाकी है ॥

बांसुरी

बजाता हूँ बांसुरी

संग गाती है वीणा धारिणी

वर्षा होती नीरदों से प्रसूनों की ,

मेरे धुन पर

बलखाती, नाच दिखाती

रम्भा, मेनका,

तिलोत्तमा और उर्वशी

सुरपति के दरबार की ;

छन-छन आवाज़ करते घुंघरू

सुर लगाते सुरीले स्वर में ,

पैजन बजते, कंगन खनकते

कोयल कूकती, सजनी सजती

मेरे आने के इंतज़ार में ;

सावन फाल्गुन में

चार चाँद लगाती

पूर्णिमा की चांदनी ,

पल-पल मेरे हाथों में

हाथ डाले फ़िज़ाएं चलती

सैर करती जैसे झील में

स्नान करती सुंदरी मन्दाकिनी ;

बुलाया गया हूँ

लाखों भटके युवाओं की

प्रज्वलित नैनों की

उज्जवल कल में

उल्लास है जो मनानी ,

प्यासी आस लगाये

आशा-ए-किरण को

सागर में बहते

असहाए नौकाओं को

हैं साहिलों तक पहुंचानी ;

ग़ज़लों की वाह

कव्वालियों की तालियां

न्योता दे कहती हैं

मुझसे सदन में

ऊर्जा की झलक है दिखलानी ,

बंद नीरस आँखों से

ख्वाब देखने वाले

तमस चेहरों के

नींदें हैं चुरा लानी  ॥

 

शमशान के गोद में

शमशान के गोद में सर रख

सुन रहा हूँ असीम शान्ति को

आसमान से बरसती किरणें सूरज की

ऊष्मा दे रही जो मेरे कफ़न को

वो दूर से देख रही

भीगी, कजली, अश्कों से भरी पलकें

बुला रही हैं जो मुझे

ऐ हवा,

पहुंचा दे उस तक सन्देश मेरा

अब न आ पाऊँगा उसके आंसू पोंछने

सो रहा हूँ हमेशा के लिए

ताकि न आये उसकी याद

मुझे अब तड़पाने को  !

अगर रात न होती ?

जीवन में हमारे अगर रात न होती

तो क्या जीवन संभव होता ?

 

न हवाओं का शीतल में जलना, पलना होता

न जलते दीप, मोम का पिघलना होता

न होता राहत-ए-सांस, कल का बहाना

न पनपते सुविचार

न घोंसलों को पंछियों का इंतज़ार होता ।

 

न सुबह की रंगीली, चुलबुली रात होती

न पुरानी कहने की कोई बात होती

न होता कोई ख्वाबी हमसफ़र साकार

न सजते-संवरते सपने

न दो-दो जाम, मैख़ाना, आशिक़ परवाना होता ।

 

न चाँद, चांदनी रहस्यमयी रात होती

न तारों, जुगनुओं का तुलनात्मक प्रचार होता

न होता कल के लिए विश्राम कर तैयार सूर्य

न पाली होती

न स्थांतरण का विचार होता ।

 

न दिन, दिनकर गिनकर होता

न सप्ताह, माह साल-दर-साल होता

एक ही दिन जीता इंसान प्रतिदिन

अनंत से अनंत दूर होगा अंत

न शुरुआत, शुरुआत का अंत होता ।

 

न स्वप्न-जाल का ज़ख्म भरना होता

न पुचकार कर नींदों को सुलाना होता

न होता सूर्य का प्रातः साँझ सा लाल

प्रदुषण ध्वनि कर्ण में शान्ति फूंकना

न संतुलित व्यवहार शिष्टाचार होता ।

 

न तू, मैं, हमारा मित्र परिवार होता

न नदियों में बहता पानी जीवन आधार होता

न दुनिया बसती

न होता ये जनसैलाब

न जीव का जीवन, जीवन सा जीवन होता

दिशाएं रंगती लहूलुहान

बस चारों ओर ख़ूनी सैलाब होता ॥